रविवार, 14 नवंबर 2010

गांव-गांव लगेगी कानून की 'पाठशाला'

देशभर में बीस हजार पैरालीगल स्वयंसेवक होंगे चयनित
नई पहलकानूनी जानकारी के अभाव में नागरिक अब अपने अधिकारों से वंचित नहीं रहेंगे। लोगों को सहजता और सुलभता से कानून के कायदों से अवगत कराने के लिए नई पहल की गई है।रजाक हैदर
जोधपुर.
गांव-ढाणियों में रहने वाले आम नागरिकों को अब उनकी चौखट पर ही कानूनी जानकारी मिल सकेगी। कानूनी अज्ञानता को मिटाने के लिए भारत सरकार ने गांव-गांव में विधिक अलख जगाने का निर्णय किया है। इस योजना को अमलीजमा पहनाने का जिम्मा राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) को सौंपा गया है। नालसा की ओर से देशभर में 20 हजार और राजस्थान में करीब पांच सौ पैरालीगल स्वयंसेवक नियुक्त किए जाएंगे। यह स्वयंसेवक अपने-अपने क्षेत्र में विशेषकर गरीब और नि:शक्त लोगों की कानूनी अड़चन को दूर करेंगे। प्राधिकरण के अध्यक्ष एवं देश की शीर्ष अदालत के वरिष्ठतम न्यायाधीश अल्तमस कबीर ने राजस्थान में पैरालीगल स्वयंसेवकों का चयन करने के लिए जोधपुर के जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के विधि संकाय के पूर्व अधिष्ठाता एवं कानूनविद् प्रो. महेन्द्र कुमार भण्डारी और अधिवक्ता वन्दना भंसाली का चयन किया है।

यह है योजना
योजना के तहत पहले पैरालीगल स्वयंसेवकों को श्रम विधि, महिलाओं से जुड़े कानून, रोजगार, एफआईआर, पारिवारिक न्यायालय, उपभोक्ता अधिकार, गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकार, राजस्व कानून और सरकार की लोक कल्याणकारी योजनाओं का विधिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके बाद वे गांव-गांव जाकर इन विषयों की जानकारी लोगों को देंगे। राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष एवं उ"ा न्यायालय के न्यायाधीश प्रकाशचन्द टाटिया के मार्गदर्शन में स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। सरल भाषा में कानूनी जानकारी आम आदमी तक पहुंचाने के लिए पुस्तकें भी प्रकाशित की जाएंगी।
कौन होंगे स्वयंसेवक
स्वयंसेवकों को लेकर कोई मापदण्ड निर्धारित नहीं किया गया है। विधि विद्यार्थी, शिक्षक, सरकारी कर्मचारी, सेवानिवृत्त कर्मचारी या कोई भी व्यक्ति जो इससे जुड़कर लोगों को कानूनी जानकारी देने में सक्षम हो, वह पैरालीगल स्वयंसेवक बन सकता है। पैरालीगल स्वयंसेवकों को कार्य करने पर नालसा की ओर से प्रमाण पत्र दिया जाएगा। स्वयंसेवकों को फिलहाल वेतन का प्रावधान नहीं रखा गया है, लेकिन स्वयंसेवकों को किराया भत्ता दिया जाएगा।
क्रांतिकारी पहलआम नागरिकों को कानूनी रूप से सशक्त करने के लिए नालसा की यह क्रांतिकारी पहल है। देशभर में अब पैरालीगल स्वयंसेवक चयनित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है। स्वयंसेवकों का चयन करने के बाद उनके लिए प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए जाएंगे।
- प्रो. महेन्द्र कुमार भण्डारी,
राजस्थान के लिए नियुक्त प्रशिक्षक एवं पूर्व अधिष्ठाता, विधि संकाय जेएनवीयू

मंगलवार, 16 जून 2009

कानून की पढ़ाई पर उम्र की 'बेड़ियां'


तीस पार नहीं कर सकेंगे एलएलबी
बदले कायदे
कानून की पढ़ाई के लिए नए कायदे लागू हो गए हैं। उम्र निकलने के बाद वकील बनना मुश्किल हो जाएगा।
रजाक हैदर
जोधपुर, 11 जून। तीस साल की उम्र पार कर जाने वाले अब वकील बनने का सपना नहीं संजो सकेंगे। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने जुलाई में शुरू होने वाले नए शैक्षणिक सत्र से तो उम्र पार लोगों के कानून की पढ़ाई पर भी पाबन्दी लगा दी है। एलएलबी की पढ़ाई के लिए अब तक आयु सीमा की पाबंदी नहीं थी, लेकिन अब इंजीनियरिंग व मेडिकल शिक्षा की तर्ज पर कानूनी शिक्षा में भी आयु सीमा की बंदिश लागू हो गई है। देश के सभी विश्वविद्यालयों को प्रवेश में आयु सीमा की सख्ती से पालना करने के निर्देश दिए गए हैं।
अजा-जजा को छूट
अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग को आयु सीमा में पांच साल की छूट दी गई है। तीन साल के एलएलबी पाठ्यक्रम में ऐसे आवेदकों के लिए 35 साल आयु तय की गई है, वहीं पांच साल के पाठ्यक्रम में सामान्य वर्ग के लिए 20 तथा अन्य वर्गों के लिए 22 साल की आयु सीमा है।
शौकिया नहीं बनेंगे वकील
नौकरी या दूसरे काम-काज से फुर्सत पाकर बुढ़ापे में वकालत करने वालों के अरमान भी अब पूरे नहीं हो पाएंगे। तीस साल की उम्र के बाद इनके लिए विधि क्षेत्र के दरवाजे बंद हो जाएंगे। राज्य के कई विश्वविद्यालयों में फिलवक्त कई अधेड़ विद्यार्थी कानून पढ़ रहे हैं।
व्यास विवि बेखबर
बीसीआई के नए कायदों से जोधपुर का जयनारायण व्यास विश्वविद्यायालय फिलहाल बेखबर है। विवि की प्रवेश विवरणिका में भी इसका जिक्र नहीं है। ऐसे में निर्धारित उम्र से अधिक आयु के विद्यार्थियों को प्रवेश देने के बाद विवि इनके आवेदन खारिज नहीं कर सकेगा।
इनका कहना है...
एलएलबी में आयु सीमा तय की गई है। हमने देश के सभी विवि शिक्षण संस्थानों को इसकी इत्तला दे दी है। -जयराम बेनीवाल, उपाध्यक्ष, बार काउंसिल ऑफ इंडिया
हमारे पास फिलहाल कोई सूचना नहीं आई है। कल पता करने के बाद ही इस बारे में कुछ कह पाऊंगा। -डॉ. एम.के. भण्डारी, अधिष्ठाता, विधि संकाय, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

दोस्ती क्या है...?

किसी ने पूछा दोस्ती क्या है ?

मैने काँटो पर चल कर बता दिया.

कितना प्यार करोगे दोस्त को ?

मैने पूरा आसमान दिखा दिया.

कैसे रखोगे दोस्त को ?

मैने हल्के से फूलों को सहला दिया.

किसी की नज़र लग गयी तो..?

मैने पलकों में उसे छुपा लिया.

फिर पूछा जान से भी प्यारा दोस्त किसे कहते हो ?

मैने आपका नाम बता दिया।

गुरुवार, 1 जनवरी 2009

नया साल मुबारक हो

नव वर्ष की परम् मंगलमय

शुभ श्री प्रदायक

अनंत शुभकामनाओं के साथ सस्नेह अभिवादन स्वीकारें।

आपके चिंतन की सौरभ,
सृजन की सुरभि तथा पुरुषार्थ की सुगन्ध
पारिवारिक, सामाजिक एवं कार्मिक तेजस्विता के
संग प्रतिष्ठा वृद्धि, पद वृद्धि तथा
सकल मनोरथ सिद्धि की संवाहक बनें।

- शुभकामनाओं के साथ
रज़ाक हैदर

शनिवार, 27 दिसंबर 2008

नया साल आया है...

अपने नए अंदाज में नया साल आया है.
कुछ पुराने गमों को छोड़कर नई खुशियां लाया है.
पुरानी दुश्मनी तोड़कर, नई दोस्ती जोड़कर.
पुराने लम्हे छोड़कर, नई नवेली दुनिया लाया है.
हर याद नई होगी, हर फरियाद नई होगी.
पुराने चेहरे खोजकर नई परियां लाया है.
जो पहले सफल नहीं रहे, वे अब कामयाब होंगे.
नई उम्मीद से बुनी हुई, नई पहेलियां लाया है.
दिल में जो भी राज हो, उनपे हमें नाज़ हो.
हैदर की काया से निकालकर नया दरिया लाया है.
शहर-शहर गली-गली एक नई गूंज होगी.
एक नए काम के आगाज़ का नया नजरिया लाया है.
अपने नए अंदाज में नया साला आया है.
कुछ पुराने गमों को छोड़कर, नई खुशियां लाया है.
- रज़ाक हैदर

गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

कहना नहीं चाहिए...

वैसे कहना नहीं चाहिए। मगर नहीं कहा जाएगा तो कहा जाएगा कि मैंने कहा नहीं और कहा जाएगा तो कहा जाएगा कि मैंने कह दिया। मगर कहें ना कहें, कहने वाले तो कहते ही रहेंगे। क्योंकि कहने वालों का तो काम ही है, कहने वालों को कुछ कहना। तो फिर कुछ कहने वालों को इन कहने वालों से क्यों घबराना। अब इन कहने वालों को कुछ न कहने के लिए कहे भी कौन। क्योंकि कहने वालों को कुछ कहने से कहने वाले कहे जाने का डर है। मगर कुछ नहीं कहे जाने से तो कहने वालों के और भी कहे जाने का डर है। इन कहने वालों के डर से कुछ कहने वाले भी नहीं कह पाते। आप ही ज़रा सोचिए 'बेचारे' कहने वाले करें भी तो क्या ???

रविवार, 23 नवंबर 2008

ज़िन्दगी का सफर











बहुत सुहाना है यह शाम का मंजर।
एक दिन खत्म हो जाएगा ये ज़िन्दगी का सफर।।
दिल ये चाहे यूं ही लिखता रहे हर पल।
कभी न डगमगाए, ये कलम ऐ 'हैदर'।।
लिखावट के ज़ेरो-ज़बर में वो ताकत आए।
खुदा की सारी कायनात भी लुट जाए हम पर।।
जो भी पढ़े इन्हें, पढ़ता ही रहे हर पल।
ना उसे दिन का पता रहे, ना रहे शाम की ख़बर।।
दीन-ए-इलाही भी इनमें शामिल हों और हो सच्चे मायने।
मंजिलें भी इनसे हासिल हों और हो हासिल मंजिले डगर।।
हर आंख का तारा बनूं, हर आंख का प्यारा बनूं।
ना इसे बुरी जुबां मिले, ना लगे बुरी नज़र।।
बहुत सुहाना है यह शाम का मंजर।
एक दिन खत्म हो जाएगा ये ज़िन्दगी का सफर।।
- रज़ाक हैदर

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2008

डा. मलकाण नहीं रहे

राजस्थानी भाषा के मूर्धन्य एवं वरिष्ठ साहित्यकार डा. अस्तअली खां मलकाण की लेखनी 2 अक्टूबर को थम गई। डीडवाना के साहित्य जगत के चमकते सितारे डा. मलकाण का हृदयघात के कारण जयपुर के दु्र्लभजी अस्पताल में निधन हो गया। वे 69 वर्ष के थे। मौन तपस्वी के नाम से चिर-परिचित आभा नगरी के वरिष्ठ साहित्यकार एवं शिक्षाविद् डा. मलकाण के निधन की खबर मिलते ही नगर में शोक की लहर दौड़ गई। उन्हें ईद की नमाज के बाद डीडवाना के कायमखानी कबिऱस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। डा. मलकाण के आखिरी सफर में नगर व आस-पास के सैंकड़ों लोगों ने शिरकत कर श्रद्धासुमन अर्पित किए।राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर की ओर से गणेशीलाल व्यास उस्ताद पुरस्कार से सम्मानित डा. मलकाण की डेढ़ दजर्न कालजयी कृतियां छप चुकी है। कई गऱंथ पऱकाशन की कतार में है। उन्होंने राजस्थानी साहित्य में सतरंगी इन्दऱधनुष की भांति सभी विधाओं में अपनी छटा बिखेरी। उनका 'रामापीर' (महाकाव्य) साहित्य जगत में खासा चर्चित रहा था। वहीं 'धरम री जीत' (खण्ड काव्य) में भी उन्होंने अमिट छाप छोड़ी। शिक्षा विभाग में बतौर पऱाध्यापक 38 वर्ष सेवाएं देने वाले डा. मलकाण को राजस्थानी विकास मंच संस्थान जालोर से डी.लिट. की मानद उपाधि से भी नवाजा गया था। वर्तमान में वे गऱामोत्थान विद्यापीठ, डीडवाना में सेवारत थे। डा. मलकाण के निधन पर डीडवाना के साहित्य पऱेमियों ने गहरा दुःख व्यक्त किया है।

सोमवार, 1 सितंबर 2008

khushi

ऐसा लगता है कि मैं हवाओं में हूं, आज इतनी खुशी मिली है....ब्लाग की दुनिया में आकर मेरी पहली अभिव्यक्ति यही है। हिन्दी फिल्म के एक गीत की यह लाइन मुझे हमेशा उत्साह और उमंग से भर देती है। अपनी बात सहज और सरल ढंग से बुद्धिजिवी वर्ग के सामने रखने की इच्छा रखता है। शुरू से अपनी भड़ास लोगों के सामने निकालने की आदत रही है। स्कूल-कालेज के दिनों में मंच पर भाषण देने से मेरी यह इच्छा पूरी हो जाती। पर अब इस पर थोड़ी लगाम लगी है। उम्मीद है ब्लाग की दुनिया के मेरे साथी मेरी बात पर ज़रा नज़रें इनायत करेंगे। एहसासों के कारवां कुछ अल्फाजो पे सिमेटने चला हूँ। हर दर्द, हर खुशी, हर खाब को कुछ हर्फ़ में बदलने चला हूँ। न जाने कौन सी हसरत है इस मुन्तजिर हैदर को। अनकहे अनगिनत अरमानो को अपनी कलम से लिखने चला हूँ.....